वह बातचीत, जो अब अधूरी ही रहेगी
सुदिव्य कुमार सोनू को याद करते हुए
– अमित मोदी
कुछ इंटरव्यू इसलिए याद रह जाते हैं कि उनमें क्या कहा गया था। और कुछ मुलाकातें इसलिए, क्योंकि उनमें बहुत कुछ कहना अभी बाकी था। सुदिव्य कुमार सोनू जी के साथ मेरी बातचीत मेरे लिए हमेशा दूसरी तरह की रहेगी। जब मैंने पहली बार उन्हें कांके टॉक्स के लिए पॉडकास्ट का आग्रह किया, मैं गिरिडीह गया था। हम उनके रिसॉर्ट में बैठे थे। रिकॉर्डिंग की तैयारी थी। तभी उन्होंने बिल्कुल सहजता से कहा “आज मेरा मूड नहीं है।“
इस बात में भी मुझे उनकी एक खासियत दिखी। कोई बनावटी कारण नहीं, कोई औपचारिक बहाना नहीं। जो महसूस किया, वही कह दिया। मैंने भी कहा, “कोई बात नहीं सर, मैं यहीं रुक जाता हूं। कल कर लेते हैं।”
अगली सुबह 9 बजे का समय तय हुआ। और ठीक 9 बजे वे सामने थे। किसी मंत्री के जीवन में यह बहुत छोटी-सी बात लग सकती है, लेकिन मेरे लिए यह उस व्यक्ति के स्वभाव की एक झलक थी – कार्यक्रम टल सकता था, लेकिन एक बार समय दे दिया तो उसका सम्मान होना चाहिए। अगली सुबह जो रिकॉर्ड हुआ, वह धीरे-धीरे एक राजनीतिक इंटरव्यू से कहीं आगे निकल गया। वह उनके जीवन, संघर्ष और झारखंड की राजनीति की कई अनकही परतों की बातचीत बन गया।
उन्होंने अपने मध्यमवर्गीय परिवार और बचपन की बातें कीं। उस दौर की भी, जब परिवार को लगता था कि पढ़-लिखकर नौकरी करनी चाहिए, राजनीति में जीवन क्यों खराब करना। फिर शिबू सोरेन से हुई वह मुलाकात, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने बताया कि गुरुजी ने उनके कंधे पर हाथ रखकर पूछा था – अगर तुम्हारे जैसे पढ़े-लिखे लोग अलग राज्य के आंदोलन में नहीं आएंगे, तो आंदोलन का विस्तार कैसे होगा?
शिबू सोरेन की चर्चा करते हुए सोनू जी केवल एक राजनीतिक गुरु को याद नहीं कर रहे थे। उनके शब्दों में एक गहरा व्यक्तिगत रिश्ता दिखाई देता था। वे उन्हें राजनेता से अधिक जननेता मानते थे – ऐसा व्यक्ति जो कार्यकर्ता से ही नहीं, उसके परिवार से भी रिश्ता बनाता था। बातचीत आगे बढ़ी तो हेमंत सोरेन, उनका जेल जाना और फिर कल्पना सोरेन की सक्रिय राजनीति में एंट्री तक पहुंची। सोनू जी ने उस दौर की कई अंदरूनी बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि राजनीति में आने को लेकर कल्पना सोरेन शुरुआत में सहज नहीं थीं। उन्होंने उन्हें समझाया कि जब परिवार और पार्टी दोनों संकट में हों, तब जिम्मेदारी से अलग नहीं रहा जा सकता। फिर उन्होंने गिरिडीह की उस सभा का किस्सा सुनाया जहां हजारों लोगों के सामने बोलते हुए कल्पना सोरेन की आवाज भर आई थी। सोनू जी ने माइक संभाला और नारा लगाया – “जेल का ताला टूटेगा, हेमंत सोरेन छूटेगा।”
उनका कहना था कि कुछ ही दिनों में उन्हें महसूस हो गया था कि झारखंड की राजनीति में एक बड़ी महिला नेता उभर रही है। लेकिन हमारी बातचीत अभी पूरी नहीं हुई थी। झारखंड के भविष्य, सत्ता, राजनीति और उनके अपने अगले पड़ाव को लेकर मेरे पास कई सवाल बाकी थे। तय हुआ कि कांके टॉक्स में इसका दूसरा एपिसोड करेंगे। महज 10–12 दिन पहले मेरी उनसे फिर फोन पर बात हुई थी। उन्होंने कहा था कि इस बार मेरे सारे सवाल लेंगे। “थोड़ा फ्री होने दो। जल्दी ही तुम्हें बुलाता हूं।” मैं उस फोन का इंतजार कर रहा था। आज मालूम है – वह फोन अब कभी नहीं आएगा।
पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे केवल यह याद नहीं आता कि मैंने झारखंड के एक मंत्री का इंटरव्यू किया था। मुझे वह व्यक्ति याद आता है जिसने एक शाम बड़ी सहजता से कह दिया था कि आज मन नहीं है; अगली सुबह ठीक नौ बजे अपने वादे के मुताबिक सामने बैठा था; और फिर करीब एक घंटे तक अपने बचपन, संघर्ष, गुरु, परिवार, राजनीति और झारखंड को लेकर खुलकर बात करता रहा।
उस पॉडकास्ट के अंत में मैंने दर्शकों से कहा था कि उनके जीवन के अगले पड़ाव पर हम दूसरे एपिसोड में फिर बात करेंगे। वह दूसरा एपिसोड अब कभी रिकॉर्ड नहीं होगा। शायद इसीलिए पहला एपिसोड आज मेरे लिए पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। अब वह कांके टॉक्स के आर्काइव में रखा केवल एक पॉडकास्ट नहीं है। वह झारखंड की राजनीतिक यात्रा का एक छोटा-सा दस्तावेज है। और मेरे लिए – एक ऐसे इंसान की स्मृति, जिसके साथ बातचीत अभी खत्म नहीं हुई थी।